Friday, January 15, 2016

शुभ प्रभात बारा जानेवारी दोन हजार सोळा

चल पडा था अपनी राह में, सुरज कि थंड थंड किरणोमे....
         एक आवाज आयी नर्म सी दबी दबी, क्यू रख गये मुझे इस कोनेमें.....

      बाती बिना घर का दिया कैसे जला पावोगे....
सुबह कि किरण ना निकली तो अंधेरेमे हि खो जाओगे....

         सुरज कि रोशनी चांद कि चांदणी मन को लुभाती है....
          किमती दिया नही बाती हि सारा घर जगमगाती है....

          अंधेरेसे निकली तो कई आवाजों एक हि सवाल था क्या हुवा ?
          इन आवाजों को चिरता एक मासूम सवाल आया बच्चा कैसा है....

      यह थी हमारी पहचान हमारा अस्तित्व, हमारी मुस्कान....
       अगर वो ना होती तो ना होती आपसे मुलाखत ना जहां कि पहचान...

     जिन्होंने दिखालायी सुरज कि पहली किरण, सिखलाया खिलखीलाना...
     चलो क्यू न करे उन सबको अर्पण आजकी " विश्वप्रार्थना " ....

🌸 भगवान कि पहली पहचान और सबको शुभ प्रभात  🌸

                                           विठ्ठल घाडी,  चारकोप
                                                ९१६७७ 55203

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